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Wednesday, April 10, 2024

How krishna became Ram

 प्रभु की हर लीला भक्तों के लिए ही होती है। ऐसी ही एक लीला का साक्षी है तुलसी रामदर्शन स्थल। मान्यता है कि यहां संत कवि तुलसीदास के स्वाभिमान ने प्रभु के श्रीविग्रह को रूप परिवर्तन करने के लिए बाध्य कर दिया था। भक्ति की चरम अवस्था को छूने वाले संकल्प पर भगवान श्रीकृष्ण के विग्रह ने भक्त की इच्छानुसार मुरली मुकुट को उतारकर धनुष बाण धारण कर लिए थे।    

राधाकृष्ण की क्रीड़ास्थली वृंदावन के ज्ञान गुदड़ी में स्थित तुलसीराम दर्शन स्थल लगभग 445 वर्ष की प्राचीनता को समेटे है। पंडित सुरेशचंद्र शर्मा के अनुसार कालांतर में गोस्वामी तुलसीदास ब्रज की यात्रा करते हुए वृंदावन आए तो यहां सर्वत्र राधे-राधे की रट सुनकर उन्हें लगा कि शायद यहां के लोगों में भगवान श्रीराम के प्रति उतनी भक्ति नहीं है। इस पर मान्यता है तुलसीदास के मुख से तुरंत एक दोहा ‘राधा-राधा रटत हैं, आम ढाक अरु कैर। तुलसी या ब्रजभूमि में कहा राम सौं बैर।।’  

इसके बाद वे ज्ञानगुदड़ी स्थित श्रीकृृष्ण मंदिर में आए और भगवान कृष्ण के श्रीविग्रह के सम्मुख नतमस्तक हुए। यहां भक्त की व्याकुलता देख प्रभु ने भक्त की अभिलाषा के अनुरूप तत्क्षण धनुष-बाण हाथ में लेकर दर्शन दिए। तभी से दोहा प्रचलित हुआ कि ‘मुरली मुकुट दुराय कै, धरयो धनुष सर नाथ। तुलसी लखि रुचि दास की, कृष्ण भए रघुनाथ।।’  और यह स्थल तुलसी रामदर्शन स्थल के रूप में जाना जाने लगा। मंदिर परिसर में गोस्वामी तुलसीदास की भजन कुटी अपने अतीत की स्मृतियों और भजन के परमाणुओं के लिए आज भी विद्यमान है, जो उनके वृंदावन प्रवास का साक्ष्य है। 


कृष्णपदावली भी रची

ब्रज संस्कृति विश्वकोश के सहसंपादक डा. राजेश शर्मा का कहना है गोस्वामी तुलसीदास के समकालीन अविनाश ब्रह्म भट्ट ने गोस्वामीजी के चरित्र को तुलसी प्रकाश पोथी के अंतर्गत कलमबद्ध किया था। इससे ज्ञात होता है कि गोस्वामीजी विक्रम संवत 1628 में माघ शुक्ल पंचमी तिथि मंगलवार को ब्रज में आए थे। उन्हाेंने बताया कि तुलसीदासजी की भक्ति पर प्रभु के धनुष बाण हाथ में लेने का उल्लेख गोर्वधन यात्रा के दौरान भी मिलता है। तुलसीदासजी ने श्रीरामचरितमानस के लेखन का आरंभ विक्रम संवत 1631 में किया था। इससे तीन वर्ष पहले वे ब्रज यात्रा कर चुके थे। इसका प्रमाण उनके द्वारा रचित कृष्णपदावली में है। 


ब्रज में हुई थी नंददास से भेंट 

वृंदावन शोध संस्थान के निदेशक सतीश चंद्र दीक्षित ने बताया कि वल्लभकुल संप्रदाय के अंतर्गत अष्टछाप के प्रसिद्ध कवि नंददास तुलसी के चचेरे भाई थे। ब्रज यात्रा के क्रम में तुलसीदास की नंददास से भेंट हुई। 

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