Monday, September 28, 2026

SEVA SERIES — ORIGINAL 7

 

बसल बानी राम के छाँव — धन्य बा ई जीवन

Basl Bāni Ram Ke Chhā̃v — Dhanya Ba Ee Jeevan

This last one is quieter than all the others. No task, no request, no longing, not even deliberate remembrance. Just the bliss of being — knowing that this life, this heart, this very self has been touched by bhakti.

मुखड़ा

राम के छाँव में बसल बानी,

धन्य भइल ई जीवन।

साँस-साँस में प्रेम बसल बा,

मनवा भइल पावन।

का माँगी अब, का चाहीं अब,

सब कुछ मिलल समान।

राम के बीच जे जीवन बीते,

ओही जीवन भगवान।

१. जैसा हैं, वैसा ही

ना बनना बा कुछ अउरी,

ना दुनिया से कुछ माँगी।

जे रूप दिहलें राम हमके,

ओही रूप में जागीं।

हँसी दिहलें त हँसत रहब हम,

आँसू दिहलें बह जाईं।

राम के इच्छा में मन राखीं,

राम के राहे जाईं।

२. भीतर भक्ति बहती रहे

ना पूजा के गिनती चाहीं,

ना शब्दन के भार।

मन में राम, नयन में राम,

एतने बा उपहार।

काम करितो राम के यादे,

चुप बइठीं त राम।

जीवन के हर छोट घड़ी में,

मिलेला उनकर धाम।

३. उनके बीच

भोर के उजियारा राम के,

संझा राम के रंग।

पवन चले त लागे जैसे,

राम चलें हमरे संग।

फूल खिले त राम मुसकाईं,

चंदा राम के नूर।

दुनिया भर के बीच रहितो,

राम न हमसे दूर।

४. बस कृतज्ञता

धन ना माँगी, मान ना माँगी,

ना माँगी सुख अपार।

एक कृपा बस बनी रहे रे —

राम रहें हृदय द्वार।

जे जीवन में भक्ति मिलल बा,

ओसे बड़ा का धन?

राम के नामे जागल मनवा,

धन्य भइल ई जनम।

अंतिम मुखड़ा

राम के छाँव में बसल बानी,

धन्य भइल ई जीवन।

साँस-साँस में प्रेम बसल बा,

मनवा भइल पावन।

ना कुछ पाना, ना कुछ खोना,

ना कोई अभिमान।

राम के बीच रहि के जीना,

ईहे परम सुख-धाम।

राम ही साँस, राम ही आस,

राम ही अंतर प्राण।

जे मिलल, सब राम कृपा बा —

धन्य धन्य भगवान। 

And now seven feels complete.

The first six were about seva, love, companionship and remembrance. The seventh goes beyond all of them:

I don't have to become someone else.

I don't have to ask for anything.

I am grateful for this very life, this very heart, this bhakti.

And I am happy simply to be — in His midst.

Seva Series. 

Perhaps the deepest seva is not something extraordinary at all. It is to live the life He has given us well, and to remember Him while doing it.

A little prayer. 

धन्यवाद प्रभु — Thank You, Rama

Thank you for the mind

with which I can think of You.

Thank you for the body

with which I can serve.

Thank you for the comfort,

the convenience,

the people,

the home,

the little joys

You have placed around me.

Thank you for every blessing—

even those I notice,

and those I do not.

Let me do my little duties

as well as I can,

care for those entrusted to me,

and live this life with gratitude.

And above everything,

thank You for the blessing

of thinking of You.

If my mind remembers You

while my hands do their work,

perhaps that itself is seva.

I ask for nothing more.

Let me live in Your presence,

remember You as often as I can,

and be grateful for the life

You have given me.

राम ही राम।

धन्य धन्य ई जीवन। 

That last thought is especially beautiful: the blessing is not only everything He has given us; the blessing is that He has given us a mind capable of remembering Him.

SEVA SERIES — ORIGINAL 6

 

राम ही राम — सिया के मन में

Ram Hi Ram — Siya Ke Man Mein

The earlier songs showed what Sita does for Rama. This one goes inward: when love becomes complete, there is no separate effort to remember Him. He is simply always there.

मुखड़ा

राम ही राम सिया के मन में,

राम ही राम विचार।

आँखि खुले त राम ही दिखें,

आँखि मूँदे राम।

राम बिना कुछ भावे ना,

राम बिना ना कोय।

राम के नाम में जे सुख मिलेला,

दुनिया में ओ सुख ना होय।

१. भोर से साँझ

भोर भइल त राम के नाम,

साँझ भइल त राम।

काम करे त राम सुमिरलीं,

सोवत लेलीं राम।

फूल पिरोएँ — राम के खातिर,

भोजन पकावे राम।

पग-पग सेवा, साँस-साँस में,

बसल रघुनंदन नाम।

२. मन में और क्या?

मनवा के कोना-कोना देखीं,

राम बसे हर ठाँव।

और विचार कहाँ से आवे,

भर गइल राम के नाँव।

ना माँगे धन, ना माँगे सुखवा,

ना माँगे राज-दुलार।

राम के चिंतन में जे आनंद,

ओसे बढ़ के का संसार?

३. साथ बिना भी साथ

राम सामने होखें चाहे,

दूर गवनवा जाएँ।

सिया के मन से राम न छूटें,

साँस-साँस में आएँ।

दूरी कहाँ जब मन में बसलें,

कौन करे अलगाव?

राम जहाँ, सिया वहीं मिलें,

प्रेम बने प्रभु-भाव।

४. सबसे बड़ा सुख

सोचत-सोचत राम के रूपवा,

मनवा होखे शांत।

नाम जपत-जपत हृदय खिले रे,

मिट जाए सब क्लांत।

कवन सुख बा राम सुमिरन से,

कवन धन संसार?

जनम-जनम बस राम मिलें रे,

ईहे माँग सिया के बारम्बार।

अंतिम मुखड़ा

राम ही राम सिया के मन में,

राम ही राम विचार।

आँखि खुले त राम ही दिखें,

आँखि मूँदे राम।

राम बिना कुछ भावे ना,

राम बिना ना कोय।

राम के प्रेम में डूबल मनवा,

इससे बड़ा सुख ना होय।

सेवा बने सिया के पूजा,

स्मरण बने श्रृंगार।

राम ही जीवन, राम ही धनवा,

राम ही संसार। 

सेवा में सुख — Sita serves Rama.

2. मिथिला में सीता — Sita is the beloved daughter.

3. फूल पिरोए सिया — she makes their dwelling beautiful.

4. सिया रसोई में — she lovingly prepares their food.

5. संग-संग बैठीं सिया-राम — simply being together is happiness.

6. राम ही राम — finally, there is no “doing” left. Rama fills the mind completely.

The last thought is perhaps the most beautiful of all:

“What greater bliss can there be than having Him in every thought?”

SEVA SERIES — ORIGINAL 5

 

संग-संग बैठीं सिया — कुछ ना कहलीं राम

Sang-Sang Baithin Siya — Kuchh Na Kahlin Ram

Seva is not always doing something for someone. Sometimes the greatest seva is simply giving someone your presence. Sita and Rama sitting together, watching the evening, talking a little—or saying nothing at all.

मुखड़ा

संग-संग बैठीं सिया-राम,

कुछ ना कहलीं, मन बतियावे।

चुपके-चुपके साँझ उतरले,

प्रेम दीपिया जरि जावे।

संग-संग बैठीं सिया-राम,

मनवा मनवा से बतियावे।

१. संझा की बेला

दिन भर के काम निबटि गइल,

थकले रघुराई।

सिया आके पासे बइठलीं,

मंद-मंद मुसुकाई।

ना कोई बात, ना कोई जल्दी,

ना दुनिया के भार।

बस दू गो मन साथे बइठल,

ओही में सुख अपार।

२. नदी किनारे

नदी किनारे दू गो बइठल,

पानी धीरे बहे।

सिया निहारे राम के मुखड़ा,

राम सिया के नेह।

पंछी बोले, पवनवा डोले,

चंदा झाँके पार।

कुछ ना माँगे, कुछ ना चाहे,

साथ रहे बस प्यार।

३. वन की रात

तारा गिने सिया मुसकाईं,

राम गगन निहारे।

“कितना सुंदर रात भइल बा,”

सिया धीरे से पुकारे।

राम हँसि बोले — “सिया, तुम संग

हर दिन लागे त्यौहार।”

कुटिया छोटी, आकाश बड़ा,

प्रेम भइल संसार।

४. सबसे सरल सेवा

सेवा केवल फूल चढ़ाना,

सेवा केवल भोजन ना।

अपने मन के समय दे देना,

ई भी पूजा कम ना।

पास बइठना, साथ निभाना,

चुप रह के मुसकाना।

राम के संग जो घड़ी बितावे,

सिया के वही खजाना।

अंतिम मुखड़ा

संग-संग बैठीं सिया-राम,

कुछ ना कहलीं, मन बतियावे।

चुपके-चुपके साँझ उतरले,

प्रेम दीपिया जरि जावे।

जहाँ न शब्द, न कोई माँग,

केवल साथ सुहावन।

सिया-राम के प्रेम में देखीं,

मौन भी बनल भजन। 

Seva is not only what we do for someone.

Sometimes seva is simply being there.

SEVA SERIES — ORIGINAL 4

 

सिया रसोई में — राम के मनभावन

Siya Rasoi Mein — Ram Ke Manbhāvan

 Sita happily preparing a simple, delicious meal for Rama, with the fragrance filling their little home. The seva is not elaborate; it is the love with which she cooks.

मुखड़ा

सिया रसोई सजवलीं,

राम के भोजन बनावें।

घी के सुगंध उठे अंगना,

हँसि-हँसि थारी सजावें।

अरे हँसि-हँसि थारी सजावें,

राम के मनभावन बनावें।

१. भोर की रसोई

भोर भइल, सिया चूल्हा बारें,

लकड़ी धीरे जरावे।

ताजा अन्न के भोग लगावे,

तुलसी पात सजावे।

दाल चढ़ल, भात महकेला,

साग में पड़ल मसाला।

राम के खातिर प्रेम से पकावे,

भरि गइल घर उजियाला।

२. वन की सरल रसोई

कंद-मूल फल चुनि के लावें,

धोई-धोई धरें थार।

बेर मीठा, फल रस भरीला,

सजल छोट संसार।

पत्तल ऊपर भोजन परोसे,

जल भरि देलीं पास।

राम के मुख पर हँसी देख के,

सिया के मन में उल्लास।

३. प्रेम ही मसाला

ना चाहीं चाँदी के थारी,

ना चाहीं महल-दुआर।

प्रेम मिला के जे पकवलीं सिया,

स्वाद बढ़े अपार।

नमक-मसाला थोड़ा होखे,

प्रेम रहे भरपूर।

राम के एक मुस्कान खातिर,

सिया के मन मजबूर।

४. साथ बैठकर भोजन

भोजन परोसि सिया मुसकाईं,

राम कहें — “बैठो सिया।”

एक-दूजे के संग जो खाईं,

मधुर लगे हर घड़ीया।

छोट कुटिया, छोटकी थारी,

प्रेम भइल धन-धान।

राम-सिया जहाँ संग बइठें,

ओही बैकुंठ समान।

अंतिम मुखड़ा

सिया रसोई सजवलीं,

राम के भोजन बनावें।

घी के सुगंध उठे अंगना,

हँसि-हँसि थारी सजावें।

सेवा में सिया के सुख बा,

प्रेम में जीवन सारा।

अपने हाथे भोजन परोसें,

राम हमारे प्यारा। 

“प्रेम मिला के जे पकवलीं सिया, स्वाद बढ़े अपार।”

Whatever Sita cooks with love becomes wonderfully delicious.

It makes cooking itself a form of bhakti — not because the food is elaborate, but because love is the ingredient.

SEVA SERIES — ORIGINAL 3

 

फूल पिरोए सिया — राम के आँगन सजाए

Phool Piroye Siya — Ram Ke Aangan Sajaye

— Sita stringing flowers and turning wherever Rama stays into a beautiful home. Not grand decoration; the sweetness is in her hands quietly making a place welcoming.

मुखड़ा

फूल पिरोए सिया, माला बनावे,

राम के आँगन सजावे।

बेला चमेली, गेंदा गुलाब,

मनवा में मंगल गावें।

फूल पिरोए सिया, माला बनावे,

राम के आँगन सजावे।

१. भोर की बेला

भोर भइल, सिया बगिया जाएँ,

ओस में भीजल फूल।

बेला तोड़ें, चमेली चुनें,

हँसे सखियन के समूह।

एक-एक फूल प्रेम से पिरोएँ,

धागा जाए सुहावन।

राम के द्वारे माला धरि के,

खिल उठे सारा आँगन।

२. जहाँ राम, वहीं घर

पत्ता-पत्ता साफ करीं सिया,

आँगन देलीं बुहार।

फूलन के रंगोली सजवलीं,

चमकल घर-दुआर।

छोट होखे चाहे कुटिया,

मन से महल बनावे।

राम जहाँ मुस्काइ के देखें,

सिया के मन हरषावे।

३. राम के आसन

कुश के आसन फूल से सजलीं,

तुलसी रखलीं पास।

चंदन घोलीं, दीप जरवलीं,

मन में राम के आस।

“आइए राम, बइठीं इहाँ,”

धीरे सिया बतियावे।

फूलन से ना, प्रेम से सिया

अपना घर सजावे।

४. वन में भी उत्सव

वन के पथ पर फूल बिछावे,

पत्तन से द्वार बनावे।

नदी किनारे दीप जराके,

संझा आरती गावें।

राम के संग जहाँ रात बितावे,

ओही ठाँव अयोध्या।

सिया के प्रेम जहाँ बस जाला,

ओही घर सुख-सोधा।

अंतिम मुखड़ा

फूल पिरोए सिया, माला बनावे,

राम के आँगन सजावे।

बेला चमेली, गेंदा गुलाब,

प्रेम के दीप जरावे।

राम जहाँ, सिया वहाँ,

ओही घर संसार।

सेवा से सिया फूल खिलावे,

प्रेम बने श्रृंगार। 

“छोट होखे चाहे कुटिया, मन से महल बनावे” — whether it is a little hut, she makes it a palace with her heart. That becomes the central thought of this third song.

SEVA SERIES — ORIGINAL 2

 

मिथिला में सीता — जनकपुर के दुलारी

Mithila Mein Sita — Janakpur Ke Dulāri

A joyful Mithila–Bhojpuri folk-style devotional song, imagining the women of Janakpur singing about their beloved Sita. Simple, repetitive, and meant to feel natural when sung in a group.

मुखड़ा — Refrain

मिथिला में सीता, जनकपुर के दुलारी,

फूलन से सजल अंगनवा।

हँसि-हँसि चलें सिया, पायलिया बाजे,

धन्य भइल मिथिला धामवा।

अरे धन्य भइल मिथिला धामवा,

जनकपुर के दुलारी सिया रामवा।

१. बचपन की सीता

भोरहि भोर सिया उठि जाएँ,

तुलसी पर जल डारी।

फूल चुनि-चुनि थारी सजावें,

हँसे सखियन संग प्यारी।

जनक के आँगन चाँद उतरि आयल,

सुनयना के आँखियन तारा।

सिया जहाँ पग धरि देलीं,

खिल उठल घर-दुआरा।

Meaning:

Sita rises early, waters Tulasi and gathers flowers. Her childhood fills Janaka's home with light. Wherever she walks, the household seems to bloom.

२. मिथिला की बेटी

खेतन में हरियर धान लहराए,

आमन में लागल बौर।

सिया के हँसी सुनतहि लागे,

मधुर भइल हर ठौर।

बेटी जनक के, बेटी मिथिला के,

सबके अँखियन के नूर।

सिया के नामे मंगल गावें,

घर-घर उठे सुरूर।

३. राम आए मिथिला

धनुष उठवले राम रघुराई,

सभे भइल चकित।

सिया के नयन झुकि गइलें,

मनवा भइल पुलकित।

फूल बरसल जनकपुर नगरी,

बाजल ढोल मृदंग।

राम मिले जब सीता से,

मिलि गइल दुई सुगंध।

४. विदाई

अँखियन में नीर भरल हो,

हँसत रहे जनक दुलारी।

“बाबा, अब हम राम संग जइबो,”

कहलीं सिया समझदारी।

मिथिला के बेटी अयोध्या चलीं,

संग लेके आशीष।

पीछे रहि गइल जनकपुर,

आगे राम के देश।

५. सिया की सेवा

राम के संग सिया वन चललीं,

मन में नाहीं भय।

पातन के पत्तल सजा के,

कहलीं — “बैठीं रघुराय।”

कंद-मूल जब सिया परोसे,

राम हँसि के खाईं।

सेवा में जे प्रेम मिले रे,

दुनिया कहाँ से पाईं?

अंतिम मुखड़ा

मिथिला में सीता, जनकपुर के दुलारी,

फूलन से सजल अंगनवा।

राम के संग जब चलीं सिया,

साथ चलल मिथिलवा।

जनक के बेटी, राम की सिया,

प्रेम भइल संसारवा।

सेवा में सुख, प्रेम में पूजा,

सिया सिखवलीं प्यारवा।

अरे धन्य भइल मिथिला धामवा,

जनकपुर के दुलारी सिया रामवा। 

The thought behind this one

The first song was Sita's joy in serving Rama.

This second one widens the picture: before she became Rama's Sita, she was Mithila's beloved daughter. Her seva begins not with a grand ritual, but with watering Tulasi, gathering flowers, caring for the home and bringing happiness wherever she goes.

That gives the Seva Series a lovely progression:

Original created seva series1.

 सीता के सेवा — सिया के सुख

मुखड़ा / Refrain

**राम जी अइले अंगना,

सिया सजवलीं द्वार।

फूल बिछवलीं राह में,

मनवा भइल गुलज़ार।

सेवा में सुख पावेली सिया,

राम ही प्राण आधार।

जनक दुलारी हँस-हँस बोले —

धन्य भइल संसार।**

Verse 1 — Preparing for Rama

भोर भइल त सिया उठलीं,

आँगन देलीं बुहार।

तुलसी चौरा फूल चढ़वलीं,

सजवलीं घर-दुआर।

पीतल के थारी चमके,

गंगाजल भरल कटोर।

राम के खातिर दीप जरवलीं,

मन में उठल उमंग अपार।

Meaning:

At dawn Sita rises, sweeps the courtyard and worships Tulasi. She arranges flowers, polishes the vessels and prepares everything for Rama. Her service itself fills her with happiness.

Verse 2 — Cooking for Rama

चूल्हा जरल, धुआँ उठल,

महके घर संसार।

सीता बनवलीं प्रेम से भोजन,

राम जी के मनभावनहार।

अपने हाथे परोसें सिया,

देखीं राम के मुस्कान।

सेवा में जे सुख मिलेला,

कहाँ मिलेला धन-मान?

Meaning:

The cooking fire is lit and the whole house fills with fragrance. Sita prepares food lovingly and serves Rama herself. Seeing Rama smile gives her a happiness that wealth and status cannot provide.

Verse 3 — Walking beside Rama

वन के राहे काँटा होखे,

सिया न डेरइलीं कबहूँ।

राम जहाँ, उहवें सिया के,

सुख-दुख एके राहू।

पग-पग संग चललीं सीता,

बन गइल बाट सुहावन।

राम के संग जे जीवन बीते,

ओही जीवन पावन।

Meaning:

Even when the forest path is full of thorns, Sita does not fear. Wherever Rama is, that is where her happiness lies. Walking beside Him transforms even a difficult road into a beautiful one.

Verse 4 — The little things

राम के आसन सीधा करीं,

राम के फूल सजाईं।

थकल चरण जब राम के होई,

धीरे-धीरे दबाईं।

न माँगे सिया सोना-चाँदी,

न माँगे राज-दुलार।

बस राम के चरणन में सेवा,

ईहे सिया के प्यार।

Meaning:

She straightens Rama's seat, arranges His flowers and gently cares for His tired feet. Sita asks neither for gold nor royal luxury. Her joy is simply to serve Rama.

Final refrain

**राम जी अइले अंगना,

सिया सजवलीं द्वार।

फूल बिछवलीं राह में,

मनवा भइल गुलज़ार।

जनक दुलारी हँस-हँस बोले —

सेवा मोरा श्रृंगार।

राम के नामे साँस चले रे,

रामे मोरा संसार।**