कृष्णराज जी,
मेरो मन श्री गिरधर जी में अटक्यो ।
जाकी छवि देखत ही,
मेरो नैनन में बस गयो ॥
मोर मुकुट सिर सोहत है,
कुंडल झलमल कानन में ।
पीतांबर लहरातो है,
मन मोह्यो वृन्दावन में ॥
मुरली मधुर बजावत है,
सुर ताल सबै मन भावे ।
सुनत ही मीरा बावरी,
घर आँगन सब बिसरावे ॥
रैन दिना बस ध्यान धरूँ,
और न कछु सुख जाणूँ ।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर,
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