फूल पिरोए सिया — राम के आँगन सजाए
Phool Piroye Siya — Ram Ke Aangan Sajaye
— Sita stringing flowers and turning wherever Rama stays into a beautiful home. Not grand decoration; the sweetness is in her hands quietly making a place welcoming.
मुखड़ा
फूल पिरोए सिया, माला बनावे,
राम के आँगन सजावे।
बेला चमेली, गेंदा गुलाब,
मनवा में मंगल गावें।
फूल पिरोए सिया, माला बनावे,
राम के आँगन सजावे।
१. भोर की बेला
भोर भइल, सिया बगिया जाएँ,
ओस में भीजल फूल।
बेला तोड़ें, चमेली चुनें,
हँसे सखियन के समूह।
एक-एक फूल प्रेम से पिरोएँ,
धागा जाए सुहावन।
राम के द्वारे माला धरि के,
खिल उठे सारा आँगन।
२. जहाँ राम, वहीं घर
पत्ता-पत्ता साफ करीं सिया,
आँगन देलीं बुहार।
फूलन के रंगोली सजवलीं,
चमकल घर-दुआर।
छोट होखे चाहे कुटिया,
मन से महल बनावे।
राम जहाँ मुस्काइ के देखें,
सिया के मन हरषावे।
३. राम के आसन
कुश के आसन फूल से सजलीं,
तुलसी रखलीं पास।
चंदन घोलीं, दीप जरवलीं,
मन में राम के आस।
“आइए राम, बइठीं इहाँ,”
धीरे सिया बतियावे।
फूलन से ना, प्रेम से सिया
अपना घर सजावे।
४. वन में भी उत्सव
वन के पथ पर फूल बिछावे,
पत्तन से द्वार बनावे।
नदी किनारे दीप जराके,
संझा आरती गावें।
राम के संग जहाँ रात बितावे,
ओही ठाँव अयोध्या।
सिया के प्रेम जहाँ बस जाला,
ओही घर सुख-सोधा।
अंतिम मुखड़ा
फूल पिरोए सिया, माला बनावे,
राम के आँगन सजावे।
बेला चमेली, गेंदा गुलाब,
प्रेम के दीप जरावे।
राम जहाँ, सिया वहाँ,
ओही घर संसार।
सेवा से सिया फूल खिलावे,
प्रेम बने श्रृंगार।
“छोट होखे चाहे कुटिया, मन से महल बनावे” — whether it is a little hut, she makes it a palace with her heart. That becomes the central thought of this third song.
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