राम ही राम — सिया के मन में
Ram Hi Ram — Siya Ke Man Mein
The earlier songs showed what Sita does for Rama. This one goes inward: when love becomes complete, there is no separate effort to remember Him. He is simply always there.
मुखड़ा
राम ही राम सिया के मन में,
राम ही राम विचार।
आँखि खुले त राम ही दिखें,
आँखि मूँदे राम।
राम बिना कुछ भावे ना,
राम बिना ना कोय।
राम के नाम में जे सुख मिलेला,
दुनिया में ओ सुख ना होय।
१. भोर से साँझ
भोर भइल त राम के नाम,
साँझ भइल त राम।
काम करे त राम सुमिरलीं,
सोवत लेलीं राम।
फूल पिरोएँ — राम के खातिर,
भोजन पकावे राम।
पग-पग सेवा, साँस-साँस में,
बसल रघुनंदन नाम।
२. मन में और क्या?
मनवा के कोना-कोना देखीं,
राम बसे हर ठाँव।
और विचार कहाँ से आवे,
भर गइल राम के नाँव।
ना माँगे धन, ना माँगे सुखवा,
ना माँगे राज-दुलार।
राम के चिंतन में जे आनंद,
ओसे बढ़ के का संसार?
३. साथ बिना भी साथ
राम सामने होखें चाहे,
दूर गवनवा जाएँ।
सिया के मन से राम न छूटें,
साँस-साँस में आएँ।
दूरी कहाँ जब मन में बसलें,
कौन करे अलगाव?
राम जहाँ, सिया वहीं मिलें,
प्रेम बने प्रभु-भाव।
४. सबसे बड़ा सुख
सोचत-सोचत राम के रूपवा,
मनवा होखे शांत।
नाम जपत-जपत हृदय खिले रे,
मिट जाए सब क्लांत।
कवन सुख बा राम सुमिरन से,
कवन धन संसार?
जनम-जनम बस राम मिलें रे,
ईहे माँग सिया के बारम्बार।
अंतिम मुखड़ा
राम ही राम सिया के मन में,
राम ही राम विचार।
आँखि खुले त राम ही दिखें,
आँखि मूँदे राम।
राम बिना कुछ भावे ना,
राम बिना ना कोय।
राम के प्रेम में डूबल मनवा,
इससे बड़ा सुख ना होय।
सेवा बने सिया के पूजा,
स्मरण बने श्रृंगार।
राम ही जीवन, राम ही धनवा,
राम ही संसार।
सेवा में सुख — Sita serves Rama.
2. मिथिला में सीता — Sita is the beloved daughter.
3. फूल पिरोए सिया — she makes their dwelling beautiful.
4. सिया रसोई में — she lovingly prepares their food.
5. संग-संग बैठीं सिया-राम — simply being together is happiness.
6. राम ही राम — finally, there is no “doing” left. Rama fills the mind completely.
The last thought is perhaps the most beautiful of all:
“What greater bliss can there be than having Him in every thought?”
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