सिया रसोई में — राम के मनभावन
Siya Rasoi Mein — Ram Ke Manbhāvan
Sita happily preparing a simple, delicious meal for Rama, with the fragrance filling their little home. The seva is not elaborate; it is the love with which she cooks.
मुखड़ा
सिया रसोई सजवलीं,
राम के भोजन बनावें।
घी के सुगंध उठे अंगना,
हँसि-हँसि थारी सजावें।
अरे हँसि-हँसि थारी सजावें,
राम के मनभावन बनावें।
१. भोर की रसोई
भोर भइल, सिया चूल्हा बारें,
लकड़ी धीरे जरावे।
ताजा अन्न के भोग लगावे,
तुलसी पात सजावे।
दाल चढ़ल, भात महकेला,
साग में पड़ल मसाला।
राम के खातिर प्रेम से पकावे,
भरि गइल घर उजियाला।
२. वन की सरल रसोई
कंद-मूल फल चुनि के लावें,
धोई-धोई धरें थार।
बेर मीठा, फल रस भरीला,
सजल छोट संसार।
पत्तल ऊपर भोजन परोसे,
जल भरि देलीं पास।
राम के मुख पर हँसी देख के,
सिया के मन में उल्लास।
३. प्रेम ही मसाला
ना चाहीं चाँदी के थारी,
ना चाहीं महल-दुआर।
प्रेम मिला के जे पकवलीं सिया,
स्वाद बढ़े अपार।
नमक-मसाला थोड़ा होखे,
प्रेम रहे भरपूर।
राम के एक मुस्कान खातिर,
सिया के मन मजबूर।
४. साथ बैठकर भोजन
भोजन परोसि सिया मुसकाईं,
राम कहें — “बैठो सिया।”
एक-दूजे के संग जो खाईं,
मधुर लगे हर घड़ीया।
छोट कुटिया, छोटकी थारी,
प्रेम भइल धन-धान।
राम-सिया जहाँ संग बइठें,
ओही बैकुंठ समान।
अंतिम मुखड़ा
सिया रसोई सजवलीं,
राम के भोजन बनावें।
घी के सुगंध उठे अंगना,
हँसि-हँसि थारी सजावें।
सेवा में सिया के सुख बा,
प्रेम में जीवन सारा।
अपने हाथे भोजन परोसें,
राम हमारे प्यारा।
“प्रेम मिला के जे पकवलीं सिया, स्वाद बढ़े अपार।”
Whatever Sita cooks with love becomes wonderfully delicious.
It makes cooking itself a form of bhakti — not because the food is elaborate, but because love is the ingredient.
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